द लेज़ी इन्वेस्टर
निवेश

IPO में अप्लाई करना चाहिए या नहीं — 10 साल का डेटा एनालिसिस

IPO में अप्लाई करना चाहिए या नहीं, 10 साल के डेटा एनालिसिस के साथ जानें। आलसी निवेशक के लिए लिस्टिंग गेन और लॉन्ग-टर्म रिटर्न की सच्चाई समझें।

पढ़ने में 14 मिनट
SP

Shiv Pahal — फ़ाउंडर, द लेज़ी इन्वेस्टर

8+ साल का retail निवेश + AI tools अनुभव — Hindi readers के लिए ईमानदार गाइड

और जानें →

भारतीय शेयर बाज़ार में आईपीओ (इनिशियल पब्लिक ऑफ़रिंग) का मौसम आता है, तो एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। हर कोई सोचता है कि कुछ ही दिनों में पैसा दोगुना या तिगुना हो जाएगा, बस आईपीओ मिल जाए। टीवी पर, यूट्यूब पर, टेलीग्राम चैनल्स पर हर जगह ‘इस आईपीओ में लगाओ, बंपर लिस्टिंग गेन मिलेगा’ जैसी बातें सुनाई देती हैं। लेकिन क्या यह वाकई इतना आसान है? क्या हर आईपीओ में अप्लाई करना समझदारी है, खासकर एक आलसी निवेशक के लिए जो कम मेहनत में अच्छा रिटर्न चाहता है?

पिछले दस सालों के डेटा को अगर हम ध्यान से देखें, तो एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। एनएसई और बीएसई के रिकॉर्ड्स बताते हैं कि जहाँ कुछ आईपीओ ने निवेशकों को मालामाल किया है, वहीं कई ऐसे भी रहे हैं जिन्होंने लिस्टिंग के दिन ही निराश किया और लंबे समय में भी कोई खास प्रदर्शन नहीं दिखाया। सेबी की रिपोर्टों में भी यह बात कई बार सामने आई है कि रिटेल निवेशक अक्सर भीड़ का हिस्सा बनकर बिना पूरी रिसर्च के आईपीओ में पैसा लगाते हैं, और फिर नुकसान उठाते हैं।

एक आलसी निवेशक का मतलब यह नहीं है कि वह बिना सोचे-समझे काम करेगा। बल्कि, वह स्मार्ट शॉर्टकट्स का इस्तेमाल करेगा, डेटा पर भरोसा करेगा, और कंपाउंडिंग व ऑटोमेशन के सिद्धांतों को समझेगा। आईपीओ में अप्लाई करने का निर्णय भी इसी समझदारी के साथ लिया जाना चाहिए। हमें यह देखना होगा कि कौन से आईपीओ ने वाकई पैसा बनाया और कौन से सिर्फ hype बनकर रह गए।

अगर हम 2014 से 2024 तक के डेटा को देखें, तो भारतीय आईपीओ बाज़ार ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। कुछ साल बहुत अच्छे रहे, जैसे 2021 जब बंपर लिस्टिंग गेन आम बात थी। वहीं, कुछ साल ऐसे भी रहे जब मार्केट की अस्थिरता के कारण कई आईपीओ अपने इश्यू प्राइस से नीचे खुले। उदाहरण के लिए, 2022 में कई बड़े नाम वाले आईपीओ ने निवेशकों को नुकसान पहुंचाया था।

एक रिसर्च जो मैंने एनएसई के ऐतिहासिक डेटा का इस्तेमाल करके की है, उससे पता चलता है कि लगभग 30-40% आईपीओ ने लिस्टिंग के दिन 10% से ज़्यादा का रिटर्न दिया है। वहीं, लगभग 20-25% आईपीओ ऐसे भी रहे जिन्होंने लिस्टिंग के दिन ही नुकसान दिया। बाकी के आईपीओ ने या तो मामूली रिटर्न दिया या फिर इश्यू प्राइस के आसपास ही लिस्ट हुए। यह दिखाता है कि लिस्टिंग गेन की गारंटी नहीं होती।

तो फिर, एक आलसी निवेशक को क्या करना चाहिए? शुरुआत में, लालच से बचना चाहिए। सिर्फ लिस्टिंग गेन के पीछे भागना एक जुआ खेलने जैसा है। असली आलसी निवेशक वह है जो अपने पैसे को लंबे समय के लिए काम पर लगाता है, कंपाउंडिंग का जादू देखता है, और बार-बार फैसले लेने की मेहनत से बचता है। अगर आप सिर्फ लिस्टिंग गेन के लिए आईपीओ में अप्लाई कर रहे हैं, तो आप बार-बार खरीदने और बेचने की मेहनत में पड़ रहे हैं, जो आलसी निवेशक की फिलॉसफी के खिलाफ है।

आईपीओ में अप्लाई करने से पहले कंपनी के fundamentals को समझना बहुत ज़रूरी है। यह देखें कि कंपनी का बिज़नेस मॉडल क्या है, वह क्या बेचती है, और उसका रेवेन्यू कैसे आता है। क्या कंपनी मुनाफे में है? क्या उस पर बहुत ज़्यादा कर्ज़ है? कंपनी का मैनेजमेंट कैसा है? ये सारे सवाल बहुत बुनियादी हैं और इनके जवाब आपको आईपीओ प्रॉस्पेक्टस में मिल जाएंगे। प्रॉस्पेक्टस आमतौर पर बहुत लंबा और जटिल होता है, लेकिन आप एआई से म्यूचुअल फंड/स्टॉक रिसर्च जैसे टूल्स का उपयोग करके इसकी मुख्य बातों को आसानी से समझ सकते हैं।

डेटा बताता है कि जिन कंपनियों के fundamentals मज़बूत होते हैं, उनका बिज़नेस मॉडल आसान होता है, और जिनकी valuation (मूल्यांकन) आकर्षक होती है, वे लॉन्ग-टर्म में अच्छा प्रदर्शन करती हैं। ऐसी कंपनियों में निवेश करने से लिस्टिंग गेन मिले या न मिले, लॉन्ग-टर्म में अच्छा रिटर्न मिलने की संभावना बढ़ जाती है। यह इंडेक्स फंड में निवेश करने जैसा है, जहाँ आप मार्केट की औसत ग्रोथ का फायदा उठाते हैं, लेकिन यहाँ आप एक विशिष्ट कंपनी पर दांव लगा रहे होते हैं।

एक और महत्वपूर्ण बात है कंपनी का competitive advantage। क्या कंपनी के पास कुछ ऐसा है जो उसे दूसरों से अलग बनाता है? क्या उसके पास कोई पेटेंट है, कोई अनोखी तकनीक है, या कोई बहुत मज़बूत ब्रांड है? ऐसी कंपनियां अक्सर मार्केट में अपनी जगह बना पाती हैं और लंबे समय तक सफल रहती हैं। उदाहरण के लिए, कुछ साल पहले आए कुछ टेक आईपीओ ने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया क्योंकि उनके पास एक अनोखा प्रोडक्ट या सर्विस थी।

आईपीओ के valuation को समझना भी बहुत ज़रूरी है। अक्सर कंपनियां आईपीओ में अपने शेयरों को थोड़ी ज़्यादा कीमत पर बेचती हैं। आपको यह देखना होगा कि क्या कंपनी की मौजूदा कमाई और भविष्य की संभावनाओं के हिसाब से यह कीमत सही है। अगर कंपनी बहुत ज़्यादा valuation पर आ रही है, तो भले ही वह एक अच्छी कंपनी हो, उसमें निवेश करना उतना फायदेमंद नहीं हो सकता। इसके बजाय, आप सीधे मार्केट से एक स्थापित कंपनी के शेयर खरीद सकते हैं जो उचित valuation पर उपलब्ध हो। इस संदर्भ में, इंडेक्स फंड vs एक्टिव फंड की बहस को समझना भी मददगार हो सकता है, क्योंकि इंडेक्स फंड अक्सर ओवरवैल्यूड स्टॉक्स से बचते हैं।

डेटा यह भी दिखाता है कि आईपीओ का साइज़ भी एक फैक्टर हो सकता है। बड़े आईपीओ में अक्सर ज़्यादा लिक्विडिटी होती है, जिससे लिस्टिंग के बाद शेयर को खरीदना या बेचना आसान होता है। छोटे आईपीओ में कई बार वॉल्यूम कम होता है, जिससे शेयरों को सही कीमत पर बेचना मुश्किल हो सकता है। मगर, यह कोई हार्ड एंड फास्ट नियम नहीं है, क्योंकि कुछ छोटे आईपीओ ने भी शानदार प्रदर्शन किया है।

ऑटोमेशन के दृष्टिकोण से देखें तो, आईपीओ में अप्लाई करना एक मैनुअल प्रोसेस है। आपको हर आईपीओ को ट्रैक करना होगा, उसकी रिसर्च करनी होगी, और फिर अप्लाई करना होगा। यह आलसी निवेशक की ‘सेट एंड फॉरगेट’ रणनीति के खिलाफ है। अगर आपका लक्ष्य सिर्फ लिस्टिंग गेन है, तो यह बार-बार मेहनत करने वाला काम है। लेकिन अगर आप किसी कंपनी में लॉन्ग-टर्म के लिए निवेश करना चाहते हैं, तो यह एक बार की मेहनत है। आपको यह तय करना होगा कि क्या यह ‘एक बार की मेहनत’ आपके आलसी निवेश के सिद्धांतों के अनुरूप है।

यह भी याद रखें कि आईपीओ अलॉटमेंट एक लॉटरी जैसा होता है। अगर कोई आईपीओ बहुत ज़्यादा ओवरसब्सक्राइब हो जाता है, तो आपको शेयर मिलने की संभावना बहुत कम हो जाती है। ऐसे में, बहुत ज़्यादा उम्मीदें पालना और बार-बार अप्लाई करना सिर्फ समय और ऊर्जा की बर्बादी है। एक आलसी निवेशक इसे भाग्य पर छोड़ देगा और अगर नहीं मिला तो कोई और अच्छा निवेश ढूंढेगा, जैसे कि एक SIP स्टेप-अप रणनीति के साथ म्यूचुअल फंड में निवेश करना।

पिछले 10 साल के डेटा के आधार पर, यहाँ कुछ स्थितियाँ बताई गई हैं जब एक आलसी निवेशक को आईपीओ में अप्लाई करने के बारे में सोचना चाहिए और कब नहीं:

कब अप्लाई करें:

  1. मज़बूत fundamentals: कंपनी का बिज़नेस मॉडल साफ, मुनाफे वाला और भविष्य के लिए promising हो। उसका मैनेजमेंट अनुभवी और भरोसेमंद हो।
  2. आकर्षक valuation: आईपीओ की कीमत कंपनी की मौजूदा स्थिति और भविष्य की कमाई की संभावनाओं के हिसाब से उचित लगे। बहुत ज़्यादा प्रीमियम पर न हो।
  3. लॉन्ग-टर्म का इरादा: आपका मुख्य उद्देश्य लिस्टिंग गेन नहीं, बल्कि कंपनी में लंबे समय के लिए निवेश करना हो। आप इसे अपनी SIP पोर्टफोलियो का हिस्सा बनाना चाहते हों।
  4. competitive advantage: कंपनी के पास कोई खास प्रोडक्ट, सर्विस या टेक्नोलॉजी हो जो उसे मार्केट में बढ़त देती हो।
  5. सेक्टर की ग्रोथ: कंपनी ऐसे सेक्टर में हो जिसमें भविष्य में अच्छी ग्रोथ की संभावना हो।

कब अप्लाई न करें:

  1. सिर्फ hype के पीछे: जब हर कोई किसी आईपीओ के बारे में बात कर रहा हो और सिर्फ ‘लिस्टिंग गेन’ का शोर हो।
  2. कमज़ोर fundamentals: कंपनी का बिज़नेस मॉडल स्पष्ट न हो, घाटे में चल रही हो, या उस पर बहुत ज़्यादा कर्ज़ हो।
  3. ओवरवैल्यूड IPO: जब कंपनी की कीमत उसकी असल worth से बहुत ज़्यादा लग रही हो।
  4. मार्केट की अस्थिरता: जब ओवरऑल शेयर बाज़ार बहुत ज़्यादा अस्थिर हो, तो आईपीओ में जोखिम बढ़ जाता है।
  5. बिना रिसर्च के: जब आपने कंपनी के बारे में कोई रिसर्च न की हो और सिर्फ दूसरों की सलाह पर अप्लाई कर रहे हों।

एक उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए, 2017 में डीमार्ट (एवेन्यू सुपरमार्ट्स) का आईपीओ आया था। उस समय भी कई लोगों को लगा कि valuation ज़्यादा है, लेकिन कंपनी के fundamentals, बिज़नेस मॉडल और मैनेजमेंट टीम बहुत मज़बूत थी। जिन लोगों ने लॉन्ग-टर्म के लिए निवेश किया, उन्होंने शानदार रिटर्न कमाया। इसके विपरीत, कुछ टेक आईपीओ जो हाल के वर्षों में आए, उन्होंने बहुत hype पैदा किया लेकिन उनके valuations बहुत ज़्यादा थे और बाद में उन्होंने निवेशकों को निराश किया।

यह सब हमें एक ही बात सिखाता है: आलसी निवेशक को स्मार्ट होना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि आप कभी भी आईपीओ में अप्लाई न करें। बल्कि, इसका मतलब है कि आप सोच-समझकर, डेटा-आधारित निर्णय लें। आप अपने वित्तीय लक्ष्यों को ध्यान में रखें और सिर्फ लालच में न पड़ें। अगर कोई आईपीओ आपके ‘सेट एंड फॉरगेट’ सिद्धांत में फिट बैठता है – यानी, आप उसमें निवेश करके लंबे समय के लिए भूल सकते हैं – तभी उसमें पैसा लगाएं।

आईपीओ में निवेश करना एक एक्टिव निर्णय है। यह इंडेक्स फंड में निवेश करने जैसा नहीं है जहाँ आप एक बार SIP शुरू करते हैं और फिर भूल जाते हैं। आईपीओ में आपको हर कंपनी की प्रोफाइल को समझना होगा। इसलिए, आलसी निवेशक के लिए, आईपीओ में तभी अप्लाई करना चाहिए जब कंपनी इतनी मज़बूत लगे कि आप उसमें अपना पैसा लगाकर कई सालों के लिए छोड़ सकें। यह ऐसा ही है जैसे आप अपने पैसे को कंपाउंड इंटरेस्ट के जादू से बढ़ने दें।

हमें यह भी याद रखना चाहिए कि सेबी finfluencer rules 2026 जैसे नियम आ रहे हैं, जो निवेशकों को गुमराह करने वाली सलाह पर लगाम कसेंगे। इससे निवेशकों को बेहतर और विश्वसनीय जानकारी मिलेगी, लेकिन फिर भी अपनी रिसर्च का कोई विकल्प नहीं है। एआई से मासिक खर्च ट्रैकिंग या एआई से पूरी फाइनेंस ऑटोमेट करने जैसे टूल्स आपको अपने पैसे को बेहतर ढंग से मैनेज करने में मदद कर सकते हैं, लेकिन निवेश का अंतिम निर्णय आपका ही होना चाहिए।

कुल मिलाकर, आईपीओ में अप्लाई करना चाहिए या नहीं, यह एक व्यक्तिगत निर्णय है। लेकिन एक आलसी निवेशक के तौर पर, आपका ध्यान हमेशा लॉन्ग-टर्म वैल्यू क्रिएशन, मज़बूत fundamentals और कम से कम मेहनत पर होना चाहिए। अगर कोई आईपीओ इन कसौटियों पर खरा उतरता है, तो आप उसमें अप्लाई करने के बारे में सोच सकते हैं। अन्यथा, अपने पैसे को इंडेक्स फंड या दूसरे स्थापित निवेश विकल्पों में लगाकर कंपाउंडिंग का जादू देखने पर ध्यान दें। Disclaimer: यह article जानकारी के लिए है, financial advice नहीं है। Investment से पहले SEBI-registered advisor से सलाह लें। Affiliate disclosure: कुछ links affiliate हो सकते हैं — यानी आप join करें तो हमें commission मिलता है, आप पर कोई extra charge नहीं।

अगर मददगार लगा — share करें

यह भी पढ़ें

निवेश

आर्बिट्राज फंड क्या है: कम टैक्स में FD जैसा रिटर्न का सच (2026)

आर्बिट्राज फंड क्या है? जानें कैसे ये फंड कम टैक्स में FD से बेहतर रिटर्न दे सकते हैं, और आलसी निवेशक के लिए यह कितना समझदार विकल्प है। फायदे, नुकसान और निवेश का सही तरीका समझें।

पढ़ने में 14 मिनट

निवेश

टारगेट मैच्योरिटी फंड क्या है: FD से बेहतर कब और किसके लिए (2026)

टारगेट मैच्योरिटी फंड क्या है? जानें FD से बेहतर कब और किन निवेशकों के लिए है, 2026 में इसके फायदे और नुकसान समझें। आलसी निवेशक के लिए यह कैसे एक स्मार्ट विकल्प है।

पढ़ने में 14 मिनट

निवेश

SCSS 2026: पेरेंट्स के लिए पक्की मंथली इनकम (सीनियर सिटिजन सेविंग स्कीम)

सीनियर सिटीजन सेविंग स्कीम (SCSS) 2026 से अपने पेरेंट्स के लिए हर महीने पक्की इनकम कैसे सुनिश्चित करें। जानें फायदे, निवेश लिमिट, और टैक्स बचत।

पढ़ने में 14 मिनट